Padma Awards 2020 : कौन हैं तुलसी गौड़ा? इन्हें ‘जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया’ क्यों कहा जाता है?

”कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों”

– दुष्यंत कुमार

लगन, मेहनत और जिद्द से इंसान कुछ भी कर सकता है। इतिहास रचने के लिए उम्र, परिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा उतने मायने नहीं रखती और इस बात का जीता जागता उदाहरण हैं 77 बरस की तुलसी गौड़ा जी।

हाल ही में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाज़ा है। यूँ तो साल 2020 के लिए 4 लोगों को पद्म विभूषण, 8 पद्म भूषण और 61 को पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किए गए। लेकिन इन सभी हस्तियों के बीच जिस एक नाम ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा वह थीं कर्नाटक की पर्यावरणविद् (Environmentalist) तुलसी गौड़ा (Tulsi Gowda)। सोशल मीडिया पर सभी उनकी बात कर रहे हैं। तो आइये जानते हैं उनके जीवन, तपस्या और सफर के बारे में।

कौन हैं तुलसी गौड़ा? क्या काम करतीं हैं?

तुलसी गौड़ा एक पर्यावरणविद् हैं जो कर्नाटक राज्य के अंकोला तालुक के होन्नाली गाँव में रहती हैं। वह 30,000 से अधिक पौधे लगा चुकी हैं और वन विभाग की नर्सरी की देखभाल करती हैं। उन्होंने कभी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली। मगर फिर भी उन्होंने पर्यावरण के संरक्षण की दिशा में अतुलनीय योगदान दिया है।

कुछ लोग तुलसी को ‘जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया’ भी कहते हैं। पौधों और जड़ी-बूटियों की विविध प्रजातियों पर उनके विशाल ज्ञान के कारण उन्हें इस नाम से पुकारा जाता। वह बीते छह दशकों से सक्रिय हैं और निरंतर काम कर रही हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, जब तुलसी दो बरस की थीं तब उनके पिता दुनिया से चल बसे। मगर पिता की असमय मृत्यु तुलसी को अनोखा करने से रोक ना सकी। आज दुनिया पर्यावरण के प्रति उनके समर्पण का लोहा मान रही है। तुलसी की कहानी हमें निस्वार्थ भावना से समाज कल्याण के प्रति काम करने की प्रेरणा देती है।

खाली पैर मिली राष्टपति से

कर्नाटक की आदिवासी महिला तुलसी गौड़ा को जब पर्यावरण की सुरक्षा के लिए राष्टपति राम नाथ कोविंद ने पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया तब वह नंगे पांव और धोतीनुमा पारंपरिक कपड़े में थीं। यह बात उनके असांसारिक व्यकितत्व को दर्शाती है। देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पा कर भी उनके चेहरे का हावभाव नहीं बदला। वह सिर्फ ज़मीन से जुड़ी हुई नहीं हैं बल्कि उन्होंने ‘ज़मीन’ के लिए काम भी किया है।

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