UP Election 2022: क्या चुनाव से पहले मायावती ने सरेंडर कर दिया

देश के सबसे बड़े सूबे की यानी उत्तर प्रदेश की चार बार मुख्यमंत्री बनने का तमगा रखने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती की सक्रियता आगामी विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं दिख रही है । यह जानते और समझते हुए की पिछले चुनाव में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी ।

विधानसभा चुनाव 2022

जहां एक तरफ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव रैली पर रैली रथयात्रा निकाल रहे है तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी जो वर्तमान में सत्ताधारी पार्टी है योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी योजनाओं का पिटारा खोलते हुए लोकार्पण और परियोजनाओं की झडी लगा दी है पीएम नरेंद्र है की यूपी में बीजेपी के लिए एक के बाद एक दौरे कर रहे है जनसभाओं में विपक्ष पर तीखे हमले बोल रहे है मतलब की समाजवादी पार्टी और बीजेपी आगामी विधानसभा चुनाव के लिए मैदान पर उतर चुकी है तो वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती विलुप्त नजर आ रही है । क्योंकि चुनाव के लिए अब सिर्फ एक महीने से भी कम का वक्त रह गया है ऐसे में बसपा पार्टी और मायावती की मैदान पर ना दिखती सक्रियता ने जनता , मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए कई सवाल छोड़ दिए है आज हम उन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे कि आखिर मायावती अभी भी चुनावी मैदान से क्यों दूर है

कहां है बसपा सुप्रीमो मायावती

कभी दलितों और मुस्लिमों कि हितैषी समझी जाने वाली बसपा पार्ट आज हाशिए पर खड़ी है । खासकर दलितों की मसीहा बनकर राजनीति में कदम रखने वाली बसपा यूपी में चार बार सत्ता पर काबिज रही रही है ।

उत्तर प्रदेश की दूसरी तेज तर्रार अपने तीखे तेवरों और कड़े फैसले के लिए जाने वाली मायावती मुख्यमंत्री रहीं थी । पिछले दो विधानसभा चुनाव में मिली हार ने जैसे उनको और उनकी पार्टी को तोड सा दिया हो । 2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो बसपा की बोहनी तक नहीं हुई फिर बहुत किरकिरी हुई थी, अगर पिछले चुनाव की बात करें तो बसपा 19 सीट जीतकर तीसरे पायदान पर रही थी लेकिन मौजूदा समय में मायावती मैदान पर नहीं सिर्फ सोशल मीडिया पर नजर आ रही है पार्टी की नुमाइंदगी हो या फिर विपक्ष पर हमला बोलना हो मायावती ट्विट के जरिए या फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चुनावी तैयारी कर रही है । उनका मैदान पर न उरतना बहुत से सवालों को जन्म दे रहा है ये अलग बात है कि बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा चुनावी मैदान पर नजर आ रहे है रैलियां भी कर रहे है लेकिन जो भीड़ और मजमा मायावती की रैली में दिखती थी उसी जगह सतीश चंद्र मिश्रा की रैली फीकी फीकी नजर आ रही है ।

क्या दलित और मुस्लिम वोट ने मुंह मोड़ लिया

बसपा पार्टी ने जब चुनाव में राजनीति बिसात बिछाई थी तो दलित वोट बैंक के भरोसे ही बिछाई थी । लेकिन धीरे धीरे बसपा को समझ आने लगा कि सिर्फ दलित वोट से सत्ता हासिल नहीं की जा सकती । फिर धर्म की राजनीति करते हुए मुस्लिमों की हितैषी बन गई ।

कांग्रेस पर आग उगलने लगी । मुस्लिम भी समझने लगा कि इतने सालों में कांग्रेस ने हमें दिया ही क्या है और मुस्लिमों का झुकाव बसपा की ओर झुक गया । जाट , ब्राम्हण और कुछ पिछड़ा वर्ग के वोट ने मायावती को चार बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया । जनता की सोच और राजनीति बदलती रहती है आज दलित मायावती से बहुत दूर जा चुका है ।

दलित को जहां बीजेपी ने अपने खेमे में शामिल कर लिया क्योंकि मोदी सरकार की फ्री राशन फ्री गैस कनेक्शन , शौचालय , तमाम योजनाओं ने दलितों को बीजेपी की ओर कर दिया तो वहीं मुस्लिम का झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ आया तभी तो सपा 2012 में सत्ता में आयी थी आजम खां जैसे बड़े मुस्लिम नेता सपा का दाहिना हाथ थे । आज भी मुस्लिम के पास सपा के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं दिख रहा । मायावती के खेमे से नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे कई बड़े नेता नहीं है मतलब साफ है कि आज बसपा के साथ ना तो दलित है और ना ही मुस्लिम । इसलिए बसपा कमजोर नजर आ रही है ।

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