पढ़िये साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार प्राप्त कवि अनुज लुगुन की कविता ‘गुवा-नुआमुंडी’

[गुवा-नुआमुंडी के (1980 ई.) शहीदों के प्रति]

इतने बरसों बाद भी
राख जीवित है इन पहाड़ों में 
जंगल में जैसे अभी ही
थोड़ी देर पहले आग लगी हो 

उन्नत पहाड़ों के गर्भ से जन्म लिए बच्चे
आज भी यहाँ वही दृश्य देख रहे हैं
जो पहले उनके पुरखों ने देखा था 
उनके साँवले तपे चेहरे का रंग
मिट रहा है उन खदानों की धूल से 
जिसने फिर से उस तारीख़ को घसीट लाया है 
उनके जंगली गाँव में 
जो तीस साल पहले झुलस गया था


गुवा-नुआमुंडी, किरीबुरू
और हतना बुरू के शिखर
अपने पड़ोसियों से दूर होते जा रहे हैं
धँसते जा रहे हैं धरती में और अंदर
अपना आत्मसम्मान खोते पहाड़
मरणासन्न जन रहे हैं बच्चे
कि कल गुवा-नुआमुंडी था
आज हतना बुरू है
कल और कोई पहाड़ जन्म लेगा
धरती में समा जाने के लिए
अजीब है! दूसरी ओर की दुनिया
ख़ुश हो रही है पहाड़ों के दफ़न होने से
कि वह समृद्ध और ख़ुशहाल हो रही है…!

कल मेरा गाँव गुवा-नुआमुंडी में था आज हतना बुरू में है 
कल और किसी पहाड़ में शरणार्थी होगा
फिर अगले दिन किसी और पहाड़ में 
इसी तरह एक दिन मैं फेंक दिया जाऊँगा अंततः मरुस्थल में 
मुझे प्यास लगेगी और मेरे पास नहीं रहेंगे
पहाड़ और उसके पड़ोसी बादल
मेरे गीतों के लिए नहीं रहेगा नदियों का राग

मेरे मापक हैं गुवा और नुआमुंडी के पहाड़
जिससे मैं मापता हूँ सभ्यता की ऊँचाइयाँ
मेरी मुट्ठी में वही गर्म राख है दुनिया के मानचित्र के लिए।

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