आज पढ़िये हर-दिल-अज़ीज़ शायर Kumar Vishwas की पांच रचनाएँ!

डॉ कुमार विश्वास युवाओं के अत्यन्त प्रिय कवि हैं। उनका लिखा एक बार में ही ज़बान में चढ़ जाता है। मंच संचालन, गायन, काव्य वाचन, पाठन, लेखन आदि सब विधाओं में निपुण कुमार विश्वास हिंदी के प्राध्यापक भी रह चुके हैं। आज हम आपके लिए ले कर आये हैं कुमार विश्वास जी की वो पांच रचनाएँ जिन्हें हर हाल में आपको पढ़ना चाहिए।

उनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलती

उनकी ख़ैरो-ख़बर नहीं मिलती
हमको ही ख़ासकर नहीं मिलती

शायरी को नज़र नहीं मिलती
मुझको तू ही अगर नहीं मिलती

रूह में, दिल में, जिस्म में दुनिया
ढूंढता हूँ मगर नहीं मिलती

लोग कहते हैं रूह बिकती है
मैं जहाँ हूँ उधर नहीं मिलती

खुद को आसान कर रही हो ना

खुद को आसान कर रही हो ना
हम पे एहसान कर रही हो ना

ज़िन्दगी हसरतों की मय्यत है
फिर भी अरमान कर रही हो ना

नींद, सपने, सुकून, उम्मीदें
कितना नुक्सान कर रही हो ना

हम ने समझा है प्यार, पर तुम तो
जान-पहचान कर रही हो ना

तुम्हें जीने में आसानी बहुत है

तुम्हें जीने में आसानी बहुत है
तुम्हारे ख़ून में पानी बहुत है

ज़हर-सूली ने गाली-गोलियों ने
हमारी जात पहचानी बहुत है

कबूतर इश्क का उतरे तो कैसे
तुम्हारी छत पे निगरानी बहुत है

इरादा कर लिया गर ख़ुदकुशी का
तो खुद की आखँ का पानी बहुत है

तुम्हारे दिल की मनमानी मेरी जाँ
हमारे दिल ने भी मानी बहुत है

बात करनी है, बात कौन करे

बात करनी है, बात कौन करे
दर्द से दो-दो हाथ कौन करे

हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं
चाँद ना हो तो रात कौन करे

हम तुझे रब कहें या बुत समझें
इश्क में जात-पात कौन करे

जिंदगी भर कि कमाई तुम थे
इस से ज्यादा ज़कात कौन करे

साल मुबारक

उम्र बाँटने वाले उस ठरकी बूढ़े ने
दिन लपेट कर भेज दिए हैं
नए कैलेंडर की चादर में
इनमें कुछ तो ऐसे होंगे
जो हम दोनों के साझे हों।
सब से पहले
उन्हें छाँट कर गिन तो लूँ मैं!
तब बोलूँगा
‘साल मुबारक‘
वरना अपना पहले जैसा
हाल मुबारक!

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