Uttar Pradesh में क्या योगी उपयोगी साबित होंगे?

भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। वैसे यूपी का माहौल हमेशा ही पोलिटिकल रहता है, चाहे चुनाव हों या ना हों। इसका सबसे बड़ा कारण है डबल इंजन की सरकार। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले दम पर 403 में 311 सीट जीतकर यह घोषित कर दिया था कि ‘मंदिर वहीं बनेगा’। मोदी की लोकप्रियता और हिंदुत्व की राजनीति के बदौलत भाजपा को 2017 में बिना किसी सीएम चेहरे अपार व अभूतपूर्व सफलता मिली। उत्तर प्रदेश की जनता जनार्दन ने न सिर्फ अखिलेश के ‘काम बोलता है’ को बहिष्कृत किया बल्कि यूपी के ‘लड़कों’ अखिलेश-राहुल के ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ के नारे को भी अस्वीकार किया।

किसी ने नहीं सोचा था कि 22 करोड़ की जनसंख्या वाले राज्य की कमान एक भगवाधारी संन्यासी को दी जायेगी। गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरखनाथ मन्दिर के महन्त योगी आदित्यनाथ ने 21 वें मुख्यमंत्री पद की शपथ देकर सभी को चौका दिया। हिंद, हिंदू और हिंदूत्व की राजनीति के साथ कभी ना समझौता करने वाले योगी आदित्यनाथ की आज पूरे हिंदुस्तान में तूती बोलती है। इसीलिए उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने कुछ दिन पहले इस बात का जोरो शोरों के ऐलान किया था कि योगी ही उत्तर प्रदेश का सीएम चेहरा रहेंगे क्योंकि उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश बना है।

योगी के प्रतिद्वंद्वियों की सूची लंबी है। और प्रतिद्वंद्वियों को इस बात की अनुभूति है कि राम मंदिर शिलान्यास, सीएए विरोधी प्रदर्शनकारियों पर एक्शन, लव जिहाद बिल, शहरों के नाम बदलना, गंगा किनारे वाले गांवों में गंगा चबूतर, कांवड़ियों पर हेलीकॉप्टर से फूलों की बारिश करवा कर योगी सरकार ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को धार दी है। जातिवाद के खिलाफ मुखर रहे योगी आदित्यनाथ ने माफियाओं की जब्त की गयी जमीन पर गरीबों और दलितों के लिए मकान बनाने की घोषणा की है। इसके अलावा योगी सरकार ने नोएडा 50 मेट्रो स्टेशन का नाम बदलकर ‘प्राइड स्टेशन’ कर दिया, जो ट्रांसजेंडर समुदाय को समर्पित है। योगी ने वक़्त वक़्त पर चौकाने वाले फैसले लिए हैं। तुष्टिकरण की राजनीति को खारिज कर के उन्होंने अपनी फैन फोलोइंग बनाई है।

मगर इन सब के बाबजूद विपक्षियों के पास ऐसे कई मुद्दे हैं जिसके तहत योगी सरकार पर निशाना साध कर उन्हें कटघरे में खड़ा किया जा सकता है। जैसे कोरोना की दूसरी लहर के दौरान योगी सरकार का शुरुआती दौर में बेबस प्रदर्शन, यूपी के नौजवानों में बढ़ती बेरोजगारी, हाथरस कांड या सबसे विवादित लखीमपुर-खीरी केस जिसके घटनाक्रम की कड़ियाँ जोड़ने में पुलिस जुटी हुई है।

अखिलेश, प्रियंका, मायावती और तमाम विरोधियों को योगी आदित्यनाथ को रोकने के लिए सुझबुझ से रणनीति बनानी होगी। वर्ना अयोध्या के बाद, योगी कहीं काशी, मथुरा ना पहुँच जाएं।

खैर, जीवन अनिश्चित है और कल किसी ने नहीं देखा है। मगर राजनीति की समझ रखने वालों के मुताबिक योगी का पलड़ा भारी है। जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के भाई भतीजावाद से जनता त्रस्त हो चुकी है। वहीं कांग्रेस में लीडरशिप की कमी दिखती है। और बहन मायावती की राजनीति आज की तारीख में अप्रचलित हो चुकी है। हाँ, अगर सभी विपक्षी एक साथ मैदान में उतर जाएं तब फेरबदल की गुंजाइश हो सकती है।

(यह लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं)

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